वाचा बांधने के लिए दो जन का ज़रुरी है. एक आदमी दुसरा आदमी के साथ वाचा बांधता है और एक दुसरे को कुछ शर्त पूरा करने के लिए वादा करते है. वैसा ही प्रभु भी मनुष्य के साथ वाचा बांधा है. मनुष्यों और जीवित प्राणियों को जल प्रलय के द्वारा नही मारेगा, दुनिया मे पाप होकर भी. जैसा नूह का समय मे किया वैसा नही करोगे. नूह खरा आदमी था इसलिए वो जल प्रलय से बच गया. परमेश्वर न्यायी है और हमेशा चुप नहीं रहोगे. उसका कोप दुष्टता और दुष्ट लोगो पर आता है और आएगा. जो कोई अपना मन फिराएगा, जो पाप छोड देगा और प्रभु की सच्चाई पर चलोगे, जो विश्वास रखेगा प्रभु यीशु के नाम पर वो निश्चय मुक्ति पाएगा. आज पश्चाताप कर, आज विश्वास कर
September 24, 2009
August 25, 2009
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August 13, 2009
प्रभु की स्तुती हो!
जो लोग यीशु पर विश्वास करता है और उसके नाम में जमा होता है, उन के सामने मै वाचा के बारे मे बता रहा हूँ।
बाइबल के पहला पुस्तक उत्पत्ति का ६वाँ अध्याय मे लिखा है:
जब मनुष्य भूमि के ऊपर बहुत बढने लगे, … तब याहवे ने कहा, “मेरा आत्मा मनुष्य से सदा लों विवाद करता न रहेगा, क्योंकि मनुष्य भी शरीर ही है; उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी।” याहवे ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है। और याहवे पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। तब याहवे ने कहा, “मैं मनुष्य को जिसकी मैं ने सृष्टि की है पृथ्वी के ऊपर से मिटा दूँगा;…क्योंकि मैं उनके बनाने से पछताता हूँ।” परन्तु याहवे के अनुग्र्ह की दृष्टि नूह पर बनी रही।
तब परमेश्वर ने नूह से कहा, “सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्र्व से भर गई है, इसलिए मैं उनको पृथ्वी समेत नष्ट कर डालूँगा। इसलिए तू …एक जहाज बना ले, …और सुन, मैं आप पृथ्वी पर जल-प्रलय करके सब प्राणियों को, जिनमें जीवन का प्राण है, आकाश के नीचे से नष्ट करने पर हूँ; और सब जो पृथ्वी पर हैं मर जाएँगे। परन्तु तेरे संग मैं वाचा बाँधता हूँ; इसलिए तू अपने पुत्रों स्त्री और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो, …जहाज में ले जाकर, अपने साथ जीवित रखना। …परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।
उत्पत्ति ७: १२ और वर्षा चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृथ्वी पर होती रही। १७ पृथ्वी पर चालीस दिन तक जल-प्रलय होता रहा; और पानी बहुत बढ़्ता ही गया, जिससे जहाज़ ऊपर को उठने लगा; २४ और जल पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक प्रबल रहा।
जब नूह ने देखा कि धरती सूख गई तब परमेश्वर ने नूह से कहा, तू…जहाज़ में से निकल आ। तब नूह ने याहवे के लिए एक वेदी बनाई; और सब शुद्ध पशुओं और सब शुद्ध पक्षियों में से कुछ कुछ लेकर वेदी पर होमबलि चढ़ाया।
फिर परमेश्वर ने नूह और उसके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा, “फूलो-फलो, और बढ़ो और पृथ्वी में भर जाओ।…सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे;…पर मांस को प्राण समेत अर्थात लहू समेत तुम न खाना।…सुनो, मैं तुम्हारे साथ और तुम्हारे पश्चात़् जो तुम्हारा वंश होगा, उसके साथ भी वाचा बाँधता हूँ; और सब जीवित प्राणियों से भी जो तुम्हारे संग है,…अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिए फिए जल-प्रलय न होगा।”
May 9, 2009
April 7, 2009
परमेश्वर के वचन के सिद्धान्त सम्बन्धी सत्यों की नींव
मृत कार्यो से पश्चाताप
उद्देश्य: प्रत्येक को आधारभूत शिक्षण सत्यों से परिचित कराना। आपको इन सत्यों की पूर्ण समझ होनी चाहिए, उन्हें कंठस्थ करे और अपने जीवन पर लागू करें।
समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।
पश्चाताप का अर्थ – शैतान व पाप की आज्ञाकारिता से फिरना तथा यीशु व उसके वचन को नये स्वामी व प्रभु के रुप में मानना।
परिभाषा : पश्चाताप परमेश्वर के आत्मा का कार्य है हमारे भीतर। यह हमें पूर्णतया बदल देता है पाप व परमेश्वर के प्रति। पश्चाताप के द्वारा मनुष्य का हृदय परमेश्वर के लिए जागरुक होता है। पश्चाताप से पहले मनुष्य पाप से अपने स्वामी के रुप मे प्रेम, सेवा व आज्ञा पालन करता है। पश्चाताप के बाद वह पाप से फिर जाता है, पाप से घृणा करता है तथा मसीह में नए जीवन की शक्ति से पाप पर जय पाता है।
February 10, 2009
होंगे कामयाब
होंगे कामयाब
होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन
हम चलेंगे साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
मन में है विश्वास पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
होंगी शांति चारो ओर
होंगी शांति चारो ओर
होंगी शांति चारो ओर एक दिन
मन में है विश्वास पूरा है विश्वास
होंगी शांति चारो ओर एक दिन
-गिरिजा कुमार माथुर
September 9, 2008
प्रभु परमेश्वर का प्रेम कैसा है?
प्रभु तेरा प्यार सागर से भी गहरा,
तू है महान आसमानों से भी ऊंचा
तेरे विचार सागर की रेत से ज्यादा
प्रभु तेरा दिल सृष्टी से भी है बडा
August 27, 2008
क्या आप विश्राम पाना चाहते है ?
हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मै तम्हे विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योकि मैं नम्र और मन में दीन हूं, और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। (यीशु)
July 28, 2008
चुनौती
क्या प्रभु के पीछे चलना और उसका काम करना एक चुनौती नहीं है? आज का जमाना में नवजवानो के लिए सचमुच एक बडा चुनौती है। अपने दोस्तो के बीच में रह के उनकी जैसा बरताव न करना, उनके जैसा न बोलना कठीन है। प्रभु हम को संसार मे होके संसार से अलग किया है। हमको स्वर्ग की ओर बढने के लिए बुलाया गया है। हमेशा संसार उसकी तरफ खींच लेने की कोशिष करता है। प्रभु ने इसलिए पवित्र आत्मा, बाइबल, प्रार्थना और उसके लोग दिया है मदद करने के लिए। हम सीख लेते है आराधना करना आत्मा और सच्चाई से जिसके द्वारा हमारा सम्बन्ध प्रभु के साथ बढता है। शास्त्र के द्वारा सच्चाई जान जाता है – सहभागिता से सम्बन्धी बढता है – और फिर सेवा करने का जिस के द्वारा पिता का महिमा होता है।
July 21, 2008
मेरा जवाब
जी हा सभी धर्म नैतिकता सिखाता है। यह बात अच्छा है। लेकिन कितने पालते है, सिर्फ ईश्वर ही जान सकता है। कोमेंन्ट के लिए धन्यवाद।
संसार में पाप और अनैतिकता फैल गया है, और अगर हम एक दूसरे के लिए रुक जाए तो यह बदलेगा नहीं। हर बात प्रभु के सामने है। कुछ भी चुपा हुआ नहीं है। एक दिन वो गुप्त बात भी खुल जाएगा। अभी हम मन फिराना चाहिए और विश्वास करना चाहिए स्वर्गीय राज्य का खुशखबर में। पाप करने के लिए छोडना चाहिए और सही करने कि लिए सीखना चाहिए।