मई 14, 2014

देव कसा आहे?

Filed under: God, Jesus, Spirit, life — the3rdone @ 4:01 अपराह्न
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देव जो पिता, तो स्वर्गात आहे. कोणाही माणसाने त्याला कधी पाहिले नाही. देव जो पुत्र म्हणजे प्रभु येशु. लहान बाळ बनून तो या जगात आला आणि 33 वर्षे येथे राहिला. आमच्या पापांसाठी तो वधस्तंभावर मरण पावला; त्याला पुरले गेले; पण तिस्र्या दिवशी तो मरणातून उठला. तो आमचा जिवंत तारक आहे. देव जो पवित्र आत्मा, जो दिसू शकत नाही पण खराखुरा व्यक्ती असून, पिता आणि पुत्र यांच्यासमान त्याचे सामर्थ्य आणि गौरव आहे.

देव सर्वत्र आहे. आपण मानव असल्यामुळे आणि आपल्याला शरीर आसल्यामुळे आपण एका वेळी फक्त एकाच ठिकाणी असू शकतो। पण देव हा आत्मा असल्यामुळे देव एकाच वेळी सर्वत्र असू शकतो। जगात आपण कोठेही गेलो तरी देव तेथे आपल्याबरोबर आहे। तो आत्मा असल्यामुळे आपण त्याला पाहू शकत नाही, पण तो नेहमी आपल्यासोबत असतो।

देव नीतिमान आहे. याचा अर्थ असा की देव नेहमी जे योग्य तेच करतो। देव पवित्र आणि नीतिमान असल्यामुळे सर्व पापाला शिक्षा देणे त्याला क्रमप्राप्त आहे। तो आमच्या पापांकडे डोळेझाक करू शकत नाही किंवा त्याविषयी त्याला काही कल्पना नाही असे तो भासवू शकत नाही। पण आमच्या सर्व पापांची क्षमा व्हावी म्हणून देवाने एक मार्ग तैयार केला आहे।आमच्या पापांसाठी मरण्यासाठी त्याने त्याचा पुत्र पाठवले।

देव विश्वसनीय आहे। याचा अर्थ असा की, देव नेहमी आपले वचन पाळतो। जे काही करण्याचे अभिवचन देव देतो, त्याप्रमाणे तो नेहमीच करतो। तो सत्यवचनी देव आहे।

देव बदलत नाही। देव नेहमी सारखा आहे। तो कधीही बदलत नाही।

देव सर्वज्ञानी आहे. देवाला सर्व काही माहीत आहे। आणि जे योग्य ते तो नेहमी करतो।


अक्टूबर 18, 2012

God’s method for victory over sin

Filed under: God, Jesus, Spirit, life — the3rdone @ 1:01 अपराह्न
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Yes, there is a God-ordained method whereby a living saint can live a victorious life over sin.

Do you not know it is mechanically impossible for a Christian to continue to live a life of habitual sin?

The Christian has changed masters, and that serving the Lord Jesus, it is not his nature to sin. The first thing we must settle is regarding the word “sin”, does it refer to acts of sin committed by the believer, or to the totally depraved nature still in him? In Romans chapter six, sin is personified since it reigns as king. But one cannot conceive of acts of sin reigning as king in the life of a person. That can only be the evil nature still resident in the believer. Every time the word “sin” is used in chapter six of Romans, it refers to the evil nature in the Christian. Read the following verses and substitute the words “sinful nature” for the word “sin”, and see what a flood of light is thrown upon your understanding of this section of Scripture (1, 2, 6, 10, 11, 13, 14, 16-18, 20, 22, 23). Thus in chapter six, Paul is not talking about what kind of a life the believer should live, but by what method or how he should live that life. The question “Shall we continue (habitually to sustain the same relationship to the sinful nature that we sustained before we were saved, a relationship in which we were fully yielded to and dependent upon that sinful nature and) all this as a habit of life?” is dealt with in this chapter. The basic question is regarding the believer’s relationship to the sinful nature. Acts of sin in his life being the result of the degree of his yieldedness to the sinful nature. It is a mechanical impossibility for a Christian to habitually sustain the same relationship to the evil nature that he sustained before God saved him. It is against our nature to habitually yield to the evil nature. We are not persons of such a nature as to do so. Paul tells us two things are the result of a major surgical operation which God performs in the inner being of every sinner He saves. They are the breaking of the power of indwelling sin, and the impartation of the divine nature. Christians are dead to the sinful nature. God used his surgical knife to cut the believing sinner loose from his sinful nature. This occurred potentially in the mind and purpose of God when that believing sinner, elected to salvation before the universe was created, was identified with the Lord Jesus in His death on the cross, and actually, the moment he placed his faith in Him as Saviour. Now, while God separated the believing sinner from the evil nature, yet He did not take it out of him, but left it in him. While there is a definite cleavage between the believer and the sinful nature yet that nature remains in him until he dies or is glorified. Any person who holds the theory that the sinful nature is eradicated at a certain point in the Christian’s experience is only deceiving himself. So far as God is concerned, He has so thoroughly done His work that that separation could be permanent. But alas, because of the frailty of man, the Christian at infrequent times does yield to the evil nature and sin. But, God has so constituted him that he need not do so. He has imparted the divine nature which gives the Christian a hatred of sin and a love for righteousness. In addition to this, the holy Spirit has been caused to take up His permanent residence in him to aid him in his battle against sin, and in his effort to live a Christian life. An illustration:

The Christian has the same power over the evil nature that he has over his radio. When a program suddenly comes over the air unfit for Christian ears, he can shut the radio off. Before salvation, the evil nature had absolute dominion over the sinner. Since salvation has wrought its beneficent work in his inner being, he has absolute dominion over it. Believe this, child of God, and act upon it. The evil nature is a dethroned monarch.

The holy Spirit at the time of the sinner’s salvation, enthroned the Lord Jesus in the throne room of the believer’s heart. He stays on the throne as long as the believer keeps yielded to the Spirit and rejects the behest of the evil nature. When the believer sins, the dethroned king, the evil nature, mounts to the throne, with the consequent dethronement of the Lord Jesus, However, such a procedure cannot go on indefinitely nor often, for God puts a curb upon such a thing by sending suffering, chastening, and the Christian is made most miserable by a guilty conscience and the indwelling Holy Spirit who is grieved at such conduct.


अगस्त 13, 2009

प्रभु की स्तुती हो!

Filed under: Beginners,God, Jesus, Spirit, life — the3rdone @ 6:31 अपराह्न
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जो लोग यीशु पर विश्वास करता है और उसके नाम में जमा होता है, उन के सामने मै वाचा के बारे मे बता रहा हूँ।
बाइबल के पहला पुस्तक उत्पत्ति का ६वाँ अध्याय मे लिखा है:
जब मनुष्य भूमि के ऊपर बहुत बढने लगे, … तब याहवे ने कहा, “मेरा आत्मा मनुष्य से सदा लों विवाद करता न रहेगा, क्योंकि मनुष्य भी शरीर ही है; उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी।” याहवे ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है। और याहवे पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। तब याहवे ने कहा, “मैं मनुष्य को जिसकी मैं ने सृष्टि की है पृथ्वी के ऊपर से मिटा दूँगा;…क्योंकि मैं उनके बनाने से पछताता हूँ।” परन्तु याहवे के अनुग्र्ह की दृष्टि नूह पर बनी रही।
तब परमेश्वर ने नूह से कहा, “सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्र्व से भर गई है, इसलिए मैं उनको पृथ्वी समेत नष्ट कर डालूँगा। इसलिए तू …एक जहाज बना ले, …और सुन, मैं आप पृथ्वी पर जल-प्रलय करके सब प्राणियों को, जिनमें जीवन का प्राण है, आकाश के नीचे से नष्ट करने पर हूँ; और सब जो पृथ्वी पर हैं मर जाएँगे। परन्तु तेरे संग मैं वाचा बाँधता हूँ; इसलिए तू अपने पुत्रों स्त्री और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो, …जहाज में ले जाकर, अपने साथ जीवित रखना। …परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।
उत्पत्ति ७: १२ और वर्षा चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृथ्वी पर होती रही। १७ पृथ्वी पर चालीस दिन तक जल-प्रलय होता रहा; और पानी बहुत बढ़्ता ही गया, जिससे जहाज़ ऊपर को उठने लगा; २४ और जल पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक प्रबल रहा।
जब नूह ने देखा कि धरती सूख गई तब परमेश्वर ने नूह से कहा, तू…जहाज़ में से निकल आ। तब नूह ने याहवे के लिए एक वेदी बनाई; और सब शुद्ध पशुओं और सब शुद्ध पक्षियों में से कुछ कुछ लेकर वेदी पर होमबलि चढ़ाया।
फिर परमेश्वर ने नूह और उसके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा, “फूलो-फलो, और बढ़ो और पृथ्वी में भर जाओ।…सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे;…पर मांस को प्राण समेत अर्थात लहू समेत तुम न खाना।…सुनो, मैं तुम्हारे साथ और तुम्हारे पश्चात़् जो तुम्हारा वंश होगा, उसके साथ भी वाचा बाँधता हूँ; और सब जीवित प्राणियों से भी जो तुम्हारे संग है,…अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिए फिए जल-प्रलय न होगा।”

सितम्बर 9, 2008

प्रभु परमेश्वर का प्रेम कैसा है?

Filed under: Intermediate — the3rdone @ 4:14 अपराह्न
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प्रभु तेरा प्यार सागर से भी गहरा,
तू है महान आसमानों से भी ऊंचा
तेरे विचार सागर की रेत से ज्यादा
प्रभु तेरा दिल सृष्टी से भी है बडा

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